85% OBC SC ST DALIT क्यू चाईए आरक्षण: ब्राह्माणवादी RSS को करारा जवाब

अनारक्षित वर्ग के लोगों के तर्क कुछ इस प्रकार होते है :-
1. आरक्षण का आधार गरीबी होना चाहिए
2. आरक्षण से अयोग्य व्यक्ति आगे आते है
3. आरक्षण से जातिवाद को बढ़ावा मिलता है
4. आरक्षण ने ही जातिवाद को जिन्दा रखा है
5. आरक्षण केवल दस वर्षों के लिए था
6. आरक्षण के माध्यम से सवर्ण समाज की वर्तमान पीढ़ी को दंड दिया जा रहा है
इन बेतुके तर्कों के जवाब इस प्रकार है :-
पहले तर्क का जवाब :- आरक्षण कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है, गरीबों की आर्थिक वंचना दूर करने हेतु सरकार अनेक कार्यक्रम चला रही है और अगर चाहे तो सरकार इन निर्धनों के लिए और भी कई कार्यक्रम चला सकती है। परन्तु आरक्षण हजारों साल से सत्ता एवं संसाधनों से वंचित किये गए समाज के स्वप्रतिनिधित्व की प्रक्रिया है। प्रतिनिधित्व प्रदान करने हेतु संविधान की धारा 16 (4) तथा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 330, 332 एवं 335 के तहत कुछ जाति विशेष को दिया गया है।


दूसरे तर्क का जवाब :- योग्यता कुछ और नहीं परीक्षा के प्राप्त अंक के प्रतिशत को कहते हैं। जहाँ प्राप्तांक के साथ साक्षात्कार होता है, वहां प्राप्तांकों के साथ आपकी भाषा एवं व्यवहार को भी योग्यता का मापदंड मान लिया जाता है। अर्थात अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के छात्र ने किसी परीक्षा में 60 % अंक प्राप्त किये और सामान्य जाति के किसी छात्र ने 62 % अंक प्राप्त किये तो अनुसूचित जाति का छात्र अयोग्य है और सामान्य जाति का छात्र योग्य है। आप सभी जानते है कि परीक्षा में प्राप्त अंकों का प्रतिशत एवं भाषा, ज्ञान एवं व्यवहार के आधार पर योग्यता की अवधारणा नियमित की गयी है जो की अत्यंत त्रुटिपूर्ण और अतार्किक है। यह स्थापित सत्य है कि किसी भी परीक्षा में अनेक आधारों पर अंक प्राप्त किये जा सकते हैं। परीक्षा के अंक विभिन्न कारणों से भिन्न हो सकते है। जैसे कि किसी छात्र के पास सरकारी स्कूल था और उसके शिक्षक वहां नहीं आते थे और आते भी थे तो सिर्फ एक। सिर्फ एक शिक्षक पूरे विद्यालय के लिए जैसा की प्राथमिक विद्यालयों का हाल है, उसके घर में कोई पढ़ा लिखा नहीं था, उसके पास किताब नहीं थी, उस छात्र के पास न ही इतने पैसे थे कि वह ट्यूशन लगा सके। स्कूल से आने के बाद घर का काम भी करना पड़ता। उसके दोस्तों में भी कोई पढ़ा लिखा नहीं था। अगर वह मास्टर से प्रश्न पूछता तो उत्तर की बजाय उसे डांट मिलती आदि। ऐसी शैक्षणिक परिवेश में अगर उसके परीक्षा के नंबरों की तुलना कान्वेंट में पढने वाले छात्रों से की जायेगी तो क्या यह तार्किक होगा। इस सवर्ण समाज के बच्चे के पास शिक्षा की पीढ़ियों की विरासत है। पूरी की पूरी सांस्कृतिक पूँजी, अच्छा स्कूल, अच्छे मास्टर, अच्छी किताबें, पढ़े-लिखे माँ-बाप, भाई-बहन, रिश्ते-नातेदार, पड़ोसी, दोस्त एवं मुहल्ला। स्कूल जाने के लिए कार या बस, स्कूल के बाद ट्यूशन या माँ-बाप का पढाने में सहयोग। क्या ऐसे दो विपरीत परिवेश वाले छात्रों के मध्य परीक्षा में प्राप्तांक योग्यता का निर्धारण कर सकते हैं? क्या ऐसे दो विपरीत परिवेश वाले छात्रों में भाषा एवं व्यवहार की तुलना की जा सकती है? यह तो लाज़मी है कि स्वर्ण समाज के कान्वेंट में पढने वाले बच्चे की परीक्षा में प्राप्तांक एवं भाषा के आधार पर योग्यता का निर्धारण अतार्किक एवं अवैज्ञानिक नहीं तो और क्या है?
तीसरे और चौथे तर्क का जवाब :- भारतीय समाज एक श्रेणीबद्ध समाज है, जो छः हज़ार जातियों में बंटा है और यह छः हज़ार जातियां लगभग ढाई हज़ार वर्षों से मौजूद है। इस श्रेणीबद्ध सामाजिक व्यवस्था के कारण अनेक समूहों जैसे दलित, आदिवासी एवं पिछड़े समाज को सत्ता एवं संसाधनों से दूर रखा गया और इसको धार्मिक व्यवस्था घोषित कर स्थायित्व प्रदान किया गया। इस हजारों वर्ष पुरानी श्रेणीबद्ध सामाजिक व्यवस्था को तोड़ने के लिए एवं सभी समाजों को बराबर–बराबर का प्रतिनिधित्व प्रदान करने हेतु संविधान में कुछ जाति विशेष को आरक्षण दिया गया है। इस प्रतिनिधित्व से यह सुनिश्चित करने की चेष्टा की गयी है कि वह अपने हक की लड़ाई एवं अपने समाज की भलाई एवं बनने वाली नीतियों को सुनिश्चित कर सके। अतः यह बात साफ़ हो जाति है कि जातियां एवं जातिवाद भारतीय समाज में पहले से ही विद्यमान था। प्रतिनिधित्व ( आरक्षण) इस व्यवस्था को तोड़ने के लिए लाया गया न की इसने जाति और जातिवाद को जन्म दिया है। तो जाति पहले से ही विद्यमान थी और आरक्षण बाद में आया है। अगर आरक्षण जातिवाद को बढ़ावा देता है तो, सवर्णों द्वारा स्थापित समान-जातीय विवाह, समान-जातीय दोस्ती एवं रिश्तेदारी क्या करता है? वैसे भी बीस करोड़ की आबादी में एक समय में केवल तीस लाख लोगों को नौकरियों में आरक्षण मिलने की व्यवस्था है, बाकी 19 करोड़ 70 लाख लोगों से सवर्ण समाज आतंरिक सम्बन्ध क्यों नहीं स्थापित कर पाता है? अतः यह बात फिर से प्रमाणित होती है की आरक्षण जाति और जातिवाद को जन्म नहीं देता बल्कि जाति और जातिवाद लोगों की मानसिकता में पहले से ही विद्यमान है।
पांचवे तर्क का जवाब :- प्रायः सवर्ण बुद्धिजीवी एवं मीडियाकर्मी फैलाते रहते हैं कि आरक्षण केवल दस वर्षों के लिए है, जब उनसे पूछा जाता है कि आखिर कौन सा आरक्षण दस वर्ष के लिए है तो मुँह से आवाज़ नहीं आती है। इस सन्दर्भ में केवल इतना जानना चाहिए कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति के लिए राजनैतिक आरक्षण जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में निहित है, उसकी आयु और उसकी समय-सीमा दस वर्ष निर्धारित की गयी थी। नौकरियों में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आरक्षण की कोई समय सीमा सुनिश्चित नहीं की गयी थी।
छठे तर्क का जवाब :- आज की सवर्ण पीढ़ी अक्सर यह प्रश्न पूछती है कि हमारे पुरखों के अन्याय, अत्याचार, क्रूरता, छल कपटता, धूर्तता आदि की सजा आप वर्तमान पीढ़ी को क्यों दे रहे है? इस सन्दर्भ में दलित युवाओं का मानना है कि आज की सवर्ण समाज की युवा पीढ़ी अपनी ऐतिहासिक, धार्मिक, शैक्षणिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक पूँजी का किसी न किसी के रूप में लाभ उठा रही है। वे अपने पूर्वजों के स्थापित किये गए वर्चस्व एवं ऐश्वर्य का अपनी जाति के उपनाम, अपने कुलीन उच्च वर्णीय सामाजिक तंत्र, अपने सामाजिक मूल्यों, एवं मापदंडो, अपने तीज त्योहारों, नायकों, एवं नायिकाओं, अपनी परम्पराओ एवं भाषा और पूरी की पूरी ऐतिहासिकता का उपभोग कर रहे हैं। क्या सवर्ण समाज की युवा पीढ़ी अपने सामंती सरोकारों और सवर्ण वर्चस्व को त्यागने हेतु कोई पहल कर रही है? कोई आन्दोलन या अनशन कर रही है? कितने धनवान युवाओ ने अपनी पैत्रिक संपत्ति को दलितों के उत्थान के लिए लगा दिया या फिर दलितों के साथ ही सरकारी स्कूल में ही रह कर पढाई करने की पहल की है? जब तक ये युवा स्थापित मूल्यों की संरचना को तोड़कर नवीन संरचना कायम करने की पहल नहीं करते तब तक दलित समाज उनको भी उतना ही दोषी मानता रहेगा जितना की उनके पूर्वजों को।
आरक्षण मूलनिवासियों का अधिकार है :- सरकारी सेवाओं और संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं रखने वाले पिछड़े समुदायों तथा अनुसूचित जातियों और जनजातियों से सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए भारत सरकार ने अब भारतीय कानून के जरिये सरकारी तथा सार्वजनिक क्षेत्रों की इकाइयों और धार्मिक/भाषाई अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों को छोड़कर सभी सार्वजनिक तथा निजी शैक्षिक संस्थानों में पदों तथा सीटों के प्रतिशत को आरक्षित करने की कोटा प्रणाली प्रदान की है। भारत के संसद में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व के लिए भी आरक्षण नीति को विस्तारित किया गया है।
आखिर क्यूँ बना दिया संवैधानिक आरक्षण को एक सदाबहार टाईम-पास और राजनैतिक मुद्दा? जबकि देश आजतक इसे पूर्ण रूप में लागू भी नही कर पाया है और प्राईवेट सेक्टरों व प्रमोशन में इसे अभी तक लागू नही किया। आजकल तो हर कोई मनुवादी इसकी परिभाषा ही बदलने कि कोशिश में है कोई संवैधानिक आरक्षण के लिए आर्थिक आधार कि बात कर रहा तो कोई समाप्त करने कि, संवैधानिक आरक्षण का मकसद क्या है? इसकी आवश्यक क्यूँ पड़ी? इसके क्या मायने है? जातिगत शोषण होता रहा है लेकिन जातिगत आरक्षण का विरोध क्यूँ? कुछ लोग आजकल आरक्षण को गरीबी-अमीरी से जोड़ रहे है जो बिल्कुल ही गलत परिभाषा है आरक्षण प्रतिनिधित्व के लिए उस शोषित वर्ग का जिसको ये मनुवादी इंसान भी नहीं मानते थे, उस पहचाने वंचित समुदाय को जो अभी तक मुख्यधारा में नही था उस दलित, आदिवासी को तमाम सामाजिक बाधा से बचाकर उसको सिस्टम में पर्याप्त प्रतिनिधित्व दिलाने के इसे संवैधानिक अधिकार दिया गया। सिस्टम में अपने हितों की रक्षा करने के लिए यह प्रतिनिधित्व का हक है जिसे आजकल गरीब-अमीर बनाने का यंत्र घोषित किया जा रहा है यह कैसे मान्य होगा..!! कुछ लोग आजकल आर्थिक आधार पर आरक्षण कि माँग कर रहे है उन लोगों से एक सवाल है- भाईयों जो बीपीएल कार्ड द्वारा जो सुविधाएँ मिल रही है क्या इसे आर्थिक आरक्षण नही कह सकते? कुछ लोग इसे केवल सरकारी नौकरी से जोड़कर देख रहे उन लोगों से भी पूछना चाहता हूँ - भाईयों नजर केवल सरकारी पर ही क्यूँ? सरकारी नौकरी पूरे भारत में कितनी है ? सरकारी नौकरीयों के अनुपात में प्राईवेट नौकरीयों का अनुपात क्या है और वहाँ आज कितने दलित,आदिवासी है? कम्पनीयों व पत्रकारिता में कितने पिछडे वर्ग के लोग है पूँजीपतियों? प्राईवेट सेक्टर मे आरक्षण लागू होना चाहिए क्या आप फोलो करते हो? देश मे बमुश्किल 1.5 से 2 करोड़ सरकारी नौकरी होगी उनमें आज भी उच्च पदों पर कितने दलित,आदिवासी है? बाकी प्राईवेट सेक्टर में 10-15 करोड़ नौकरीयों कौन खा रहा है? शायद आपके पास जवाब नही है..!! आरक्षण जातिगत इसलिए बनाया गया कि मनुवादीयों ने जो वर्ण व्यवस्था बनायी उनमें पिछड़े लोगों का जन्म शोषित होने के लिए रह गया उन्हें इन्सान भी नही माना जाता था जातिवाद एक सामाजिक भ्रष्टाचार है, बुराई है जब तक यह खत्म नही होगा तब तक आरक्षण भी खत्म नही होगा, ना ही उसकी परिभाषा बदलेगी। आज जब आरक्षण द्वारा दलितों की दशा सुधार की एक छोटी सी पहल होती है तो वो भी स्वर्णों की आंख में कांटा बन के चुभने लगता है | क्या स्वर्ण बंधू आरक्षण का विरोध करने से पहले वो सब करने और झेलने के लिए तैयार हैं जो दलित हजारो सालों से करता और सहता आ रहा है ? क्या सवर्ण बन्धु मल उठाने, गटर साफ़ करने, संडास साफ़ करने, पशुओं की खाल उतारने जैसे कार्यों में जो की केवल दलितों के लिए ही आरक्षित कर दिया गया है उसका विरोध कर सकते हैं? क्या सवर्ण बन्धु वो जातिसूचक गालियां खाने के लिए तैयार हैं जो उनके द्वारा दलितों के लिए बनायीं है? यदि नहीं तो फिर आरक्षण का विरोध क्यों?
©आवाज़_ए_मूलनिवासी (पेज नम्बर 42-48)

मंदिर के धन भंडार मे ब्राह्मण आरक्षण के खिलाफ मुलनिवासी प्रदर्शन

मंदिर मे पुजारी पद पे सिर्फ़ ब्राह्मण अरक्षण क्यू??? मंदिर मे जमा हुआ लखो करोरो कालाधन ग़रीब 52% OBC ओर 25% Sc/St, दलित को बाँट देना चाहिए
मेरी भी निम्न मांगे है....

1. सदियों से ब्राह्मण जिस आरक्षण को अपना धर्म कहता आ रहा है वह खत्म हो, साथ ही शंकराचार्य की कुर्सी से एक जाति विशेष का अधिकार समाप्त हो।
2. धर्म के नाम पर अंध्वविश्वास पाखण्ड फैलाने वालों के खिलाफ विशेष कानून बनाया जाए।
3. देश में जितने में भी मंदिर रजिस्ट्रर्ड या गैर रजिस्टर्ड है सभी को सरकार अपने दायरे में ले, यहां आने वाली दान दक्षिणा पर सरकारी हक होना चाहिए।
4. देश के विख्यात मंदिरों में केवल ब्राह्मण जात का आरक्षण है ब्राह्मण ही केवल पूजा-पाठ, अर्चना, दान पात्र आदि पर नियंत्रण रखता है तो इस आरक्षण को समाप्त कर सभी जाति के पंडितों(SC ST ओबीसी) को नियुक्त किया जाना चाहिए सभी के लिए समान नीति हो।
5. जातिवाद एवं जातिया खत्म की जाए ताकि जिन लोगो का भ्रम है कि मुख से पैदा होने वाले जन्म से श्रेष्ठ होते है उनका भ्रम दूर हो
सहयोग एवं सुझाव आमंत्रित है

टीपू सुल्तान: 700 ब्राह्माणवादी के खिलाफ लड़कर मुलनिवासी महिलाओं को स्थन ढकने का अधिकार

सोशियल मीडीया पे ब्राह्माणवादी यानी मनुवादी लोग मातम मानता है के टीपू ने 700 ब्राह्मण को मार दिया था.
टीपू सुलतान ने दि थी अछूत महिलाओं को स्थन ढकने की अनुमति, वही खीज आज निकाली जा रही है ।
इतिहास के झरोखे से :-टीपू सुल्तान और स्त्री स्वतंत्रता
कोई भी राजा हो क्या वह अन्याय इसलिए ना देखे और दंड ना दे कि यह अन्यायी उसके धर्म का नहीं और इस कारण से भविष्य में उस पर अन्य धर्मों के उपर किये अत्याचार के लिए गालियाँ दी जाएंगी ?

संघी और वाम इतिहासकारों ने टीपू सुल्तान को लेकर थोड़ा बड़ा दिल दिखाया पर अब टीपू सुल्तान को भी विवादित करने का प्रयास किया गया और औरंगजेब के जैसा बनाने का प्रयास किया गया , इतिहासकार टीपू सुल्तान के प्रति इस लिए झूठ ना लिख सके क्युँकि टीपू सुल्तान का सारा इतिहास बहुत करीब के दिनों का है और यह तथ्य और सबूत है कि वह अंग्रेज़ों से लड़ते हुए शहीद हुए और अपनी पूरी सल्तनत बर्बाद कर दी।
दरअसल उनको बदनाम भी केवल सवर्ण कर रहे हैं , हकीक़त यह है कि यदि इस देश के इतिहास को यदि निष्पक्ष रूप से लिख दिया जाए तो आज अचानक पैदा हो गये बड़े बड़े महापुरुष नंगे हो जाएँ और जिन्हें खलनायक बनाया जा रहा है वह देश के महापुरुष हो जाएँ ।
राजाओं की साम्राज्यवाद के कारणों से हुई लड़ाईयों को हिन्दू मुस्लिम की लड़ाई की तरह से अब प्रस्तुत किया जा रहा है और लडाई में मरने वाले सैनिकों को गिन गिन कर बताया जा रहा है कि इतने वध उस मुस्लिम शासक ने किये जैसे हिन्दू राजाओं ने युद्ध में विरोधी सेनाओं का धर्म देखकर ही मारा हो कि केवल मुस्लिम सैनिक मारें जाएँ हिन्दू सैनिकों को कोई नुकसान ना हो चाहे विरोधी सेना का ही क्युँ ना हो ।
तब तो ऐसा कुछ नहीं हुआ पर अब ऐसा ही किया जा रहा है ।
ब्रिटेन की नेशनल आर्मी म्यूजियम ने अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेने वाले 20 सबसे बड़े दुश्मनों की लिस्ट बनाई है जिसमें केवल दो भारतीय योद्धाओं को ही इसमें जगह दी गई है
नेशनल आर्मी म्यूजियम के आलेख के अनुसार टीपू सुल्तान अपनी फौज को यूरोपियन तकनीक के साथ ट्रेनिंग देने में विश्वास रखते थे। टीपू विज्ञान और गणित में गहरी रुचि रखते थे और उनके मिसाइल अंग्रेजों के मिसाइल से ज्यादा उन्नत थे, जिनकी मारक क्षमता दो किलोमीटर तक थी।
जो अंग्रेज टीपू से इतना घबराते थे उनके बनाए झूठे इतिहास को दिखाकर संघ के लोग टिपू का विरोध कर रहे हैं ।सच यह है कि विरोध कर रहे ऐसे लोग ही भारत के निष्पक्ष इतिहास के लिखने पर नंगे हो जाएँगे क्युँकि यही हर दौर में अत्याचारी रहे हैं और इसी अत्याचार को करने के लिये इन लोगों ने टीपू से अंग्रेजों की लड़ाई में अंग्रेज़ो का साथ दिया ।
त्रावणकोर के सवर्ण महाराजा , मराठे और हैदराबाद के निजाम अंग्रेजों के सबसे बड़े मित्र थे जो चारों ने मिलकर एक अकेले टीपू सुल्तान के विरूद्ध युद्व किया जिससे इनकी ऐय्याशियाँ चलती रहें देश जाए भाड़ में , चाहे इसपर अंग्रेजों का राज हो या राक्षसों का ।
दरअसल जो ब्राम्हणों की हत्याएं करने का आरोप टीपू सुल्तान पर है वह त्रावणकोर राज्य में है जहाँ का ब्राम्हण राजा एक ऐय्याश और निरंकुश राजा था और उसके जुल्मों से वहाँ की जनता से छुटकारा दिलाने के लिए टीपू ने उसपर आक्रमण किया और युद्ध में त्रावणकोर की सेना में शामिल ब्राम्हण मारे गये। और अंततः राजा को वहाँ की दलित महिलाओं को न्याय देना पड़ा ।
केरल के त्रावणकोर इलाके, खास तौर पर वहां की महिलाओं के लिए 26 जुलाई का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन 1859 में वहां के महाराजा ने दलित औरतों को शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े पहनने की इजाजत दी।
इस परंपरा की चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया और जिनको हक दिलाने के लिए टीपू सुल्तान ने उस राज्य पर आक्रमण किया।
दरअसल उस समय न सिर्फ पिछड़ी और दलित बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे।
नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था। वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं। लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था। नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था।
सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी। पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी। एक घटना बताई जाती है जिसमें एक दलित जाति की महिला अपना सीना ढक कर महल में आई तो रानी अत्तिंगल ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला।
इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं। 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए। बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने औऱ यूरोपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं।
धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया। इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर सम्मानजनक जीवन पाने की कशिश करती रहीं।यह कुलीन मर्दों को बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले होने लगे। जो भी इस नियम की अहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता।
दलित औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते। यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध कर सरे आम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ऐसा करते डरें।
1814 में त्रावणकोर के अंग्रेजों के चमचे दीवान कर्नल मुनरो ने आदेश निकलवाया कि ईसाई नादन और नादर महिलाएं ब्लाउज पहन सकती हैं।
लेकिन इसका कोई फायदा न हुआ। उच्च सवर्ण के पुरुष इस आदेश के बावजूद लगातार महिलाओं को अपनी ताकत और असर के सहारे इस शर्मनाक अवस्था की ओर धकेलते रहे।आठ साल बाद फिर ऐसा ही आदेश निकाला गया। एक तरफ शर्मनाक स्थिति से उबरने की चेतना का जागना और दूसरी तरफ समर्थन में अंग्रेजी सरकार का आदेश। और ज्यादा महिलाओं ने शालीन कपड़े पहनने शुरू कर दिए। इधर उच्च वर्ग के पुरुषों का प्रतिरोध भी उतना ही तीखा हो गया। एक घटना बताई जाती है कि नादर ईसाई महिलाओं का एक दल निचली अदालत में ऐसे ही एक मामले में गवाही देने पहुंचा। उन्हें दीवान मुनरो की आंखों के सामने अदालत के दरवाजे पर अपने अंग वस्त्र उतार कर रख देने पड़े। तभी वे भीतर जा पाईं। संघर्ष लगातार बढ़ रहा था और उसका हिंसक प्रतिरोध भी।सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था।
क्यों न होता ? आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची दलित जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें। उस रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में औरतों को ख़ड़ा रखा जाता था। राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते थे।
आखिर 1829 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया।सवर्ण पुरुषों की लगातार नाराजगी के कारण राजा ने आदेश निकलवा दिया कि किसी भी दलित जाति की औरत अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढक नहीं सकती। अब तक ईसाई औरतों को जो थोड़ा समर्थन दीवान के आदेशों से मिल रहा था, वह भी खत्म हो गया। अब हिंदू-ईसाई सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत बढ़ गई। सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं। इस पूरे आंदोलन का सीधा संबंध भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी है।
टीपू सुल्तान ने इसी अन्याय को समाप्त करने के लिए त्रावणकोर पर आक्रमण किया जिससे त्रावणकोर की सेना के तमाम लोग मारे गये जिसे आज ब्राम्हणों के वध के रूप में बताकर उनका विरोध किया जा रहा है उसी युद्व में विरोधियों ने ऊंची जातियों के लोगों दुकानों और सामान को लूटना शुरू कर दिया। राज्य में शांति पूरी तरह भंग हो गई।
दूसरी तरफ नारायण गुरु और अन्य सामाजिक, धार्मिक गुरुओं ने भी इस सामाजिक रूढ़ि का विरोध किया और अंततः 26 जुलाई 1859 को वहाँ के राजा ने दलित औरतों को स्तन ढकने की अनुमति प्रदान की ।टीपू सुल्तान से वही खीज आज निकाली जा रही है ।
ज़रा सोचिएगा कि त्रावणकोर का राजा कोई मुस्लिम होता और दलितों के साथ ऐसा व्यवहार होता तो आज क्या स्थिति होती और यदि टीपू कोई दीपू होते तो

ब्राह्माणवादी ने मारा बाबा साहेब आंबेडकर के मूर्ति को जूता - 85% मुलनिवासी के भावना आहत

देश के संविधान लिखने वाला बाबा साहेब आम्बेडकर के मूर्ति का घोर अपमान किया गया..ब्राह्माणवादी ने इस वीडियो को सोशियल मीडीया पे भी डाला..3% ब्राह्मण आज 85% मुलनिवासी के मसीहा के अपमान कर रहा है..न्बा पोलीस ना प्रशसन कोई रोकने वाला . इसे



जापान ,जर्मनी, नीदरलैंड ,इंग्लैंड ,फ़्रांस जैसे developed देश बैलेट पेपर पर चुनाव कराते और भारत जहा 80 करोड़ गरीब भूखे नंगे लोग रहते है वो देश EVM मशीन से चुनाव क्यों कराता है ,
जानते हो क्यों ?
1993 में बैलेट पेपर से हुए चुनाव से जब सपा बसपा ने यूपी से ब्राह्मणों की दो बडी पार्टी "कांग्रेस बीजेपी" दोनों को ख़त्म कर दिया था तब ब्राह्मण घबरा गए की अगर लोग सपा बसपा से जुड़ गए और इसी तरह बैलेट पेपर से चुनाव होते रहे तो कांग्रेस बीजेपी पूरे देश से ख़त्म हो जायेगी ,इसलिए ब्राह्मणों ने EVM मशीन से चुनाव कराने का षड्यंत्र रचा और उसी समय जिस EVM मशीन को यूरोप में गड़बड़ी के चलते बंद किया जा रहा था उसी मशीन को ब्राह्मण 1999 में भारत ले आये ताकि EVM मशीन में गड़बड़ी कर धीरे धीरे सपा बसपा को यूपी से भी ख़त्म किया जा सके और दुबारा ब्राह्मणों की पार्टियों मतलब कांग्रेस बीजेपी का राज लाया जा सके । ब्राह्मणों ने मकसद 2017 में पूरा किया ,जानबूझकर धीरे धीरे किया ताकि किसी को शक न हो ।

EVM सपोर्ट: अन्ना हज़ारे ने दिखाया आपना ब्राह्माणवादी चड्डी

अन्ना हज़ारे ने दिखाया आपना ब्राह्माणवादी चड्डी. देश मे मुलनिवासी आंदोलन रोकने के लिए संघ ने अन्ना हज़ारे को नया गाँधी बनाके मार्केट मे लाया था. डेमॉनेटिज़ेशन के चलते 150 भारतिया नागरिक मरने के बाद भी चुप रहने वाला ब्राह्माणवादी अन्ना ने EVM के सपोर्ट किया और वाजपा के सरकार को सही ठहराया.. देश भर मे EVM के खिलाफ OBC Sc ST Dalit Muslim Sikh ने आंदोलन कर रहा है..ये बात सबको पता चल गया के EVM मशीन को हॅक किया गया फिर भी मनुवादी मीडीया ने लगातार इस आंदोलन को दबाने क कौसीस मे लगे है..



20% मुस्लिम ने शुरू किया 3% ब्राह्माणवादी (वीदेसी) के खिलाफ मोर्चा

3 % ब्राह्मण वादी जो लोग हमेशा मुस्लिम के खिलाफ सोशियल मीडीया पे अफवाह ओर नफ़रत फेला के अनुसूचित दलित आदिवासी पीचारा जातियो को आपस मे लड़ने के साज़ीस को इन मुस्लिम नौजवान ने करारा जवाब दिया..अभी कुछ दिन पहले ब्राह्माणवादी संघ ने EVM घोटाला करके उत्तर प्रदेश मे मनुवादी शशाण कायम किया ओर दंगा करने के चक्कर मे बोहट से अफवाह ब्राह्मण वादी लोग फ़ेसबुक पे कर रहा है.



ब्राह्मण गुंडा ने दलित विधयक के सर फोडा - घोटाला करके चुनाव जितने के बाद

रामराज्य की शुरुवात ।। बहुत हुआ गुंडाराज क्यों कि अबकी बीजेपी की सरकार ।।




सत्ता के नशे में चूर भाजपा नेता ....
दलित युवक को पीटकर किया लहूलुहान ....!!
इलाहाबाद : इसे सत्ता की हनक ही कह सकते हैं कि भाजपा नेता सहर उत्तरी इलाहबाद से नवनिर्वाचित विधायक हर्ष वर्धन वाजपेयी के पिता एवं कौशाम्बी सांसद विनोद सोनकर की सह पर भाजपा नेताओं ने गुंडागर्दी की हद ही पार कर दी, गुंडागर्दी की हद तब पार हो गयी जब भाजपा नेताओं ने खुलेआम एसओ कैंट को धमकी दी, कैंट थानांतर्गत राजपुर निवाशी प्रमोद पासी उसके भाई एवं उसकी माँ को मार पीटकर किया लहूलुहान किया..!!