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स्वयं को क्षत्रिय माननेवाले यादव मुख्यमंत्री का बंगला शुद्धिकरण करेगा ब्राम्हण बीजेपी

*जो ओबीसी, एससी, एसटी का बहुजन समाज इस घमंड मे जी रहे है कि हमारी आबादी ज्यादा है और इसे कोई नही मिटा सकता, मै उन्हें ये कहना चाहूँगा की सिर्फ दो मिनट का समय निकाल कर मेरे इस पोस्ट को पढ़ें, और इसको अपनी आम ज़िन्दगी में अमल करें।*
*मैं आपका भाई आप का बेटा आपका सुभचिन्तक अनुराग यादव अतुल -जिला सचिव समाजवादी छात्रसभा-मऊ,मो० 9452655225,ईमेलः atulyadav1996@gmail.com*
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आखिर न्यायालय से ओबीसी क्यों मिट गया ?
🌪"संविधान " जो बाबा साहब अंबेडकर ने अपने बहुजनो के लिए बनाया आज उसकी हिफाजत के लिए आज वहाँ एक भी "बहुजन" नहीं बचा l
"आरक्षण " जिसका विवरण संविधान में है, जहां की राज बहुजन समाज का होना चाहिए आज उन जगहो को प्राइवेट कंपनियो को बेचा जा चुका है, और वहाँ आज एक भी बहुजन नहीं बचा l


"सचिवालय " जहां डा लोहिया ने ओबीसी, एससी, एसटी के हकदारी के लिए जी जान लगा दी आज वॅहा एक भी सचिव "ओबीसी, एससी, एसटी" नही है
"खेती मे " में 40 साल पहले तक 90% लोग करना चाहते थे, आज सिर्फ 10% बचे हैं l क्यों कि खेती पर निर्भर रहने वाली बड़ी आबादी ओबीसी वर्ग था!!
"मिडिया जगत " में जातिवाद का हालत यह है कि ओबीसी- एससी- एसटी को घुसने तक नही दिया जा रहा है!!
"देश " में बहुजनो की आबादी 85% है मगर देश के कैबिनेट मंत्रालय मे 1% भी नही है!!
"न्यायालय " मे 90% केस ओबीसी- एससी- एसटी के है मगर 1% वकिल और जज ओबीसी, एससी, एसटी के नही है!!
मित्रों, विश्वविद्यालय, विद्यालय, मे 85% बच्चे ओबीसी- एससी- एसटी के है मगर 1% डीन, वीसी, प्रोफेसर, लेक्चरर, ओबीसी- एससी- एसटी के नही है!!
देश के इकोनॉमी को 85% टैक्स आप ओबीसी- एससी- एसटी देते हो मगर मजा 3% आबादी वाला धूर्त और चालाक उठा रहा है!!
आपके पैसे को लूटकर देश के चंद लोग खा रहे है सरकार
मध्यस्थता कर रही है!!
हमेशा हिंदू के नाम पर वोट की की भीख मांगने वाले ……
जब ओबीसी- एससी- एसटी के हक और प्रतिनिधित्व की बात करो तो आप पर जातिवाद का आरोप लगाता है!!
29 राज्य है भारत के और ओबीसी- एससी- एसटी की आबादी के 25 राज्यो मे 85% से उपर है मगर केवल 5 सीएम ओबीसी - एससी- एसटी है!!
और "बहुजनो" का एक मात्र देश भारत ही अब "बहुजनो" के लिए सुरक्षित नहीं रहा l
मैंने 10 लोगों को जो कि ओबीसी- एससी- एसटी हैं, उनसे पूछा कि किस जाति के हो ?
सभी ने अलग - अलग जवाब दिया……
किसी ने कहा यादव …
किसी ने कहा पटेल …
किसी ने कहा कोईरी …
किसी ने कोहार कहा …
तो किसी ने पाल …… सब लोगों ने अलग - अलग बताया l
लेकिन मैंने 10 ब्राह्मणो से पूछा कि कौन सी जाति के हो ?
सभी का एक जवाब आया…… "ब्राह्मण "
मुझे बड़ा अजीब लगा, मैंने फिर से पूछा, फिर वही जवाब आया…… "ब्राह्मण "
तब मुझे बहुत अफसोस हुआ, और लगा हम कितने अलग और वो कितने एक……
भारत ओबीसी- एससी- एसटी का है और हम सब भारतीय और भारत के हर संसाधन पर हमारा हक होना चाहिए!!
और अगर आप को "भारतीय " होने का गर्व करते हो तो इस मैसेज को इतना फैला दो यह मैसेज मुझे वापस किसी भारतीय से ही मिले l
दिल्ली सुप्रीम कोर्ट में एक ओबीसी भाई ने जनहित याचिका डाली थी कि मंदिर मे एक ही जाति का मठाधीश और पूजारी क्यो होता है l
सुप्रीम कोर्ट ने जनहित याचिका रिजेक्ट करते हुये कहा कि "वेद " और "पूराण " के हिसाब से मंदिर पर हक ब्राह्मण का ही है क्योकि फैसला सुनाने वाला जज ब्राह्मण ही था!!
यदि योग्यता और बराबरी का हक वेद और पुराण के खिलाफ है, माननीय सुप्रीम कोर्ट के हिसाब से भारत मे बराबरी अौर संविधान की बात हराम है!!
क्या नेता इस पर कुछ टिप्पणी देंगे ?
अजीब कानून है भैया……
अपने पैसे के लिए देश लाइन मे लगा है!!
जनता का पैसा खाने वाला माल्या पंच सितारा मे पड़ा है ……
ये जो नीचे लिखा है वो कोई मज़ाक नहीं है, कल ये आपके शहर में भी हो सकता है l
अगर ये किसी ओबीसी, एससी, एसटी, किसान लेकर भागा होता तो इन जातिवादी मिडिया वाले आपको पकड़कर तिहाड़ मे डाल दिए होते!!
कुछ दिन पहले जी न्यूज के सुधीर चौधरी ने सपा के सुनील कुमार सर से तल्ख़ मुद्रा में पूछा था कि अगर देश में ब्राह्मण ज्यादा हर पद पर हो जायेंगें तो कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा ?
इसका एक प्रायोगिक उत्तर कल के एक वाकये ने दिया l
बीजेपी के शासित गुजरात मे "दलित " को इसलिए गाड़ी मे बाँधकर मारा गया कि वह उनके मरे हुए गाय को नही उठाया!!
और उन्होंने उनके पेशाब को पीने से मना कर दिया!!
मगर उन पर इस अत्याचार की कारवाई तक नही हुई वो फिर अपना अत्याचार फैला रहे है क्योकि
गुंडा भी वही है
थाने का पुलिस
थाने का दलाल
एसपी-कलेक्टर
आगे बढो तो
वकिल और नेता
यॅहा तक की जज
भी उनके जाति का है!!
आरएसएस का हालत यह है कि जो वोट के लिए हिंदू धर्म का सहारा लेता है लेकिन जब देश के 85% हिंदुओ ने आरक्षण के लिए आंदोलन किया तो उन्हे गोलियो से भून दिया!!
और जब भारत को आजादी मिली तो तिरंगे को जलाया
तिरंगे से उनकी नफरत और जय हिन्द पर आपत्ति इस सबका कारण थी l
पुलिस ने कुछ लोगों को गिरफ्तार किया लेकिन वो सब एक जाति के थे प्रशासन ने जातिवाद दिखाया उनको छोड़ दिया गया l
ध्यान रहे वो अनपढ़ लोग नहीं, वो पैदाइशी चालाक थे और आजभी है l
हाथ जोड़ के विनती है, इसे शेयर करें ये कोई छोटी खबर नहीं है l
🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻🙏🏻
*एकता में ही ताक़त है*
इसको समझीये आप लोग
अभी जब यूपी में 56 SDM कि फ़र्ज़ी खबर मीडिया और सोशल मीडिया में उड़ी तो विशेष जाति के लोग बौखला गए थे। चूँकि मामला यादवों से जुड़ा था, इसलिए अन्य जातियां भी हर तरीके से इनके साथ थी। क्योंकि यादव विरोध पर मैंने अब तक सबको एक झन्डे तले पाया है। अब 110 के करीब ब्राह्मण उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग में चयनित हुए है। कोई शोर- शराबा नहीं है, सब खामोश है। मतलब ब्राह्मण अधिकारी सर्वमान्य है। अगर यादव बनता है, तो पिछड़े और दलित भी विरोध में आ जाते है। मुझे पिछड़ों और दलितों की स्थिति उस कटी पतंग के माफिक लगती है जिसके पाने के लिए पीछे सब दौड़ते है और नहीं मिलने पर फाड़ देते है। कुछ ऐसी ही स्थिति पिछड़ों की प्रतीत होती है।
जब अनिल यादव लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष थे, तब इलाहबाद की सड़कों पर बड़ा हंगामा हुआ था। जुलुस निकाले गए थे, तोड़ फोड़ की गयी थी, और समूचे यादव समुदाय को गालियाँ दी गयी थी। उपद्रवी यहीं नहीं रुके उन्होंने गाय बैल तक को डण्डों से पीटा था, क्योंकि वो यादवों से जुड़े थे। रातो – रातों – रात ‘लोक सेवा आयोग’ को ‘यादव सेवा आयोग’ लिख दिया गया। अब मिश्रा सचिव है और 110 ब्राह्मण चयनित हुए है। लेकिन आयोग ‘ब्राह्मण लोक सेवा आयोग’ नहीं हुआ।
मैं कल्पना कर सकता हूँ जब यूपी या बिहार में पहला डीएम बना होगा तब लोगों की क्या प्रतिक्रिया रही होगी? क्या प्रतिक्रिया रही होगी जब बिहार में लालू ने पिछड़ों और शोषितो का परचम लहराया होगा? या उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह ने समाजवाद का आगाज़ किया होगा?आप आकलन कर सकते है कि चारा घोटाला जगन्नाथ मिश्र के समय शुरू हुआ और लालू यादव पर भी दोष सिद्ध हुआ पर सात समुन्दर पार तक लालू चारा चोर है, जबकि असली चोर जगन्नाथ मिश्रा को कोई जानता तक नहीं। आप दिमाग पर जोर डालेंगे तो इनके षड्यंत्रों को बखूबी समझ जाएंगे। ये वो लोग है जो किसी भी कीमत पर आपको सत्ता के केन्द्र में नहीं देखना चाहते, ‘आरक्षण’ तो बहाना मात्र है।
अगर यादव सत्ता में आये तो सत्ता का ‘यादवीकरण’ हो जाता है। क्यों जनाब? अस्सी फीसदी ब्राह्मणों को ढो रही संसद का आज तक ‘ब्राह्मणीकरण’ नहीं हुआ? साठ फीसदी से अधिक ब्राह्मणों को झेल रहे इन आयोगों का ‘ब्राह्मणीकरण’ क्यों नहीं हुआ आज तक? न्यायालयों में अस्सी फीसदी से अधिक ब्राह्मण होने के बावजूद न्यायालयों का ‘ब्राह्मणीकरण’ क्यों नहीं हुआ आज तक?जबकि वीरेंदर सिंह के चुनते ही लोकायुक्त का ‘यादवीकरण’ हो गया था।देश के इन तमाम मन्दिरों का ‘ब्राह्मणीकरण’ क्यों नहीं हुआ? जहाँ की सदियों से ब्राह्मणों की सौ फीसदी भागीदारी है।
मुझे मालूम है कि इसका कोई उत्तर नहीं मिलेगा, पर पिछड़ों को इस साजिश को समझना होगा और अपने हकों के लिए एकजुट होना होगा।
किसी ऊंचे पद पर अगर एक यादव के बाद दुसरा यादव आ जाए तो भारत का ब्राह्मणी मिडिया इसे “यादववाद” मान लेता है। किसी ऊँचे पद पर एक दलित अफसर के बाद दूसरा दलित अफसर आ जाए तो भारत का ब्राह्मणी मीडिया इसे “दलितवाद” घोषित कर देता है। लेकिन अगर एक के बाद एक दर्जन या सैकड़ों ब्राह्मण अफसर भी आ जाएँ तो भारत का ब्राह्मणी मीडिया उसे “ब्राह्मणवाद” नहीं बल्की “मेरिट” मानता है।

यह कड़वा सत्य दवा की तरह लगेगा।
ओबीसी के विरोध में हो रहे षडयंत्र कि जानकारी ओबीसी के जागृत लोगों को नहीं है
ओबीसी के लोग तो लिखे पढे लोग है
जो ब्राह्मणों नें लिखा वही पढा
इसलिए आज उनके हक अधिकार ब्राहमणी तंञ दवारा छिन लिए गयें है
संविधान कहता है कि आरक्षण (प्रतिनिधित्व )
जनसंख्या के अनुपात में शासन प्रशासन में भागीदारी है
ब्राह्मण कहते हैं यह खेरात है
ओबीसी के लिखे पढे लोगों नें बाबा साहब दवारा लिखा संविधान ब्राह्मणों कि बातों में आकर पढा ही नहीं
इसलिए आज यह हालात है कि
1)52% ओबीसी को 27% आरक्षण (प्रतिनिधित्व ) है
जबकि यह संविधान के विरोध में है
संविधान कहता है लोकतंत्र में जनसंख्या के हिसाब से प्रतिनिधित्व लोकतंत्र का प्राण है
इसलिए भारतीय लोकतंत्र में ओबीसी कि 52% शासन प्रशासन में भागीदारी होनी चाहिए
परन्तु आज आजादी के सत्तर साल बाद ब्राह्मणवादी सरकारों नें इसका non-implementation किया ओर जो हक अधिकार SC/ST को 1932 में ही मिल गये थे वह हक अधिकार ब्राह्मणों नें ओबीसी को 1992 मतलब साठ साल बाद मिले
उसमें भी असंवैधानिक क्रिमीलेयर लगा कर ओबीसी के लोगों के साथ षडयंत्र किया और आज ओबीसी का शासन प्रशासन में केवल 5% प्रतिनिधित्व है
आज ओबीसी का grade A & B कि सर्विसेज में सही प्रतिनिधित्व नहीं होने के कारण बडे लेवल पर धिरे धिरे ओबीसी कि समस्याओं का निर्माण राष्ट्रीय स्तर पर हो रहा है
यह ओबीसी के लिखे पढे लोगों को समझ नहीं आता है
ब्राह्मणों नें हिन्दुत्व के नाम पर ब्राह्मणों का राज स्थापित किया
ओबीसी को रोज नये नये षडयंत्र करके ओबीसी के लिखे पढे लोगों को हिन्दु बनाया
और सारे हक अधिकार छिन कर देश कि
विधायिका
कार्यपालिका
न्यायपालिका
और मिडिया परकब्जा किया
और अब कहते हैं
यह हिन्दु धर्म नहीं है परम्परा है
मतलब यह परम्परा मनुस्मृति अनुसार ब्राह्मण धर्म है
और ब्राह्मण धर्म का विधान लागू किया
और शुद्रों के सारे हक अधिकार छिने
यह है हकिकत
अब ओबीसी के लिखे पढे लोगों से निवेदन है कि वह ब्राह्मणों के दवारा हिन्दु नाम के षडयंत्र से बाहर निकलें
अपने आसपास नजर दोडायें
स्वतंत्र सोच रखकर संविधान में दिये आर्टिकल 340 को समझें
काका कालेलकर कमीशन क्या था वह जाने
काका कालेलकर कमीशन क्यों लागू नहीं हुआ वह जानें
मंडल कमीशन क्या है वह समझें
मंडल कमीशन क्यों इतने बरसों तक लागू नहीं हुआ वह जानने कि कोशिश करें
ओबीसी को जब मंडल कमीशन लागू हो रहा था तो उसके विरोध में किन लोगों नें राष्ट्रीय लेवल पर विरोध किया उनको जाने समझें
फिर भले ही भाईचारा निभाना
ओबीसी को प्रतिनिधित्व SC/ST कि तरह ही मिला है
वही संविधान है
वही कानून है फिर SC/ST कि जनसंख्या तो 22% है
SC/ST को 22% प्रतिनिधित्व है
परन्तु ओबीसी कि जनसंख्या 52% है
52% ओबीसी को 52% प्रतिनिधित्व क्यों नहीं है
उसमें भी षडयंत्र करके असंवैधानिक क्रिमीलेयर लगा दी
वह संविधान के विरोध में है
क्योंकि यह प्रतिनिधित्व का अधिकार मौलिक अधिकार है वह शासन प्रशासन में SC/ST/OBC को सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ेपन कि वजह से मिला है ना कि आर्थिक पिछड़े पन कि वजह से
1992 में मंडल कमीशन लागू होने के बाद भी उसका non- implementation किया ओर आज ओबीसी को आज 2016 तक 52% होने के बावजूद 5% ही प्रतिनिधित्व मिला है तो ओबीसी को यह समझना जरूरी है कि शासन प्रशासन किन लोगों के कब्जे में है
कोन लोग ओबीसी के लोगों के हक अधिकार छिन रहा है
इसलिए ओबीसी के लिखे पढे लोगों से निवेदन है कि ब्राह्मणों के हिन्दू नाम के षडयंत्र से निकल कर पढे लिखे बनें
स्वतंत्र सोच विकसित करें व आपकी आनेवाली पिढियो को इस षडयंत्र मे ना झोंके
ओर उनके हक अधिकार सुरक्षित करने कि लड़ाई लडें
यह लिंक पर जो विडियो है उसको यु-टयूब पर जाकर देखें यह ओबीसी के विरोध में हो रहे षडयंत्र को बताता है
देखने के बाद
पढने के बाद भी समझ नहीं आये तो ओबीसी के लोगों से निवेदन है कि कम से कम एक हजार लोगों को भेजें शायद किसी जागरूक को समझ आये 🙏
*ब्राह्मण जज पर रोक*
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*कलकत्ता हाईकोर्ट में ब्रिटिश काल में प्रीवी काउन्सिल हुआ करती थी। अंग्रेजों ने नियम बनाया था कि कोई भी ब्राह्मण प्रीवी काउन्सिल का चेयरमैन नहीं बन सकता। क्यों नहीं हो सकता? अंग्रेजों ने लिखा है कि ब्राह्मणों के पास न्यायिक चरित्र नहीं होता है। न्यायिक चरित्र का मतलब है निष्पक्षता का भाव। अर्थात निष्पक्ष रहकर जब एक न्यायाधीश दोनों पक्षों की दलीलें सुनता है, सभी दस्तावेजों को देख कर कानून और न्याय के सिद्धान्त के अनुसार अपनी मनमानी न करते हुए जो सही है उसे न्याय दे, उसे न्यायिक चरित्र कहते है। ऐसा न्यायिक चरित्र ब्राह्मणों में नहीं है, यह अंग्रेजों का कहना था। आज की तारीख में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के लगभग 600 न्यायाधीश हैं, उनमें 582 न्यायाधिशों की सीटें ब्राह्मण तथा ऊँची जाति के लोगों के कब्जे में हैं। जब तक न्यायपालिका को प्रतिनिधिक नहीं बनाया जाता, तब तक हमें न्याय मिलने वाला नहीं है। इसलिए न्यायपालिका को प्रतिनिधिक बनाने की आवश्यकता है।*
*भारत की न्यायपालिका पर हिन्दुओ का नहीं बल्कि ब्राह्मणों का कब्जा है, और ब्रिटिश लोग कहते थे कि, *"BRAHMINS DON'T HAVE A JUDICIAL CHARACTER"*. *यानी "ब्राह्मण का चरित्र न्यायिक नहीं होता, वो हर फैसला अपने जातिवादी हितों को ध्यान मे रखकर देता है।*
*सुप्रीम कोर्ट में बैठे ब्राह्मण जज हर फैसला OBC, SC, ST, मुसलमान, सिख, ईसाई और बौद्धों के खिलाफ ही देते है..*
*न्यायाधिशों की नियुक्ति में कोलिजियम का सिद्धान्त दुनिया के किसी भी लोकतांत्रिक देशों में नहीं है, वह केवल मात्र भारत वर्ष में ही है। इसका कारण यह है कि अल्पमत वाले ब्राह्मण लोग बहुमत वाले बहुजन लोगों पर अपना नियंत्रण बनाये रखना चाहते हैं। जो बहुमत है वह अपने हक-अधिकारों के प्रति धीरे-धीरे जागृत हो रहा है, इससे ब्राह्मणों के लिए संकट खड़ा हो रहा है। इस संकट से बचने के लिए न्यायपालिका मे बेठे ब्राह्मण न्यायपालिका का इस्तेमाल एससी एसटी ओबीसी और अल्पसंख्यक के विरुद्ध कर रहे है।*
*भारतीय हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट मे 80% जज ब्राह्मण जाति से है, और ब्राह्मण कभी न्याय का पर्याय नहीं हो सकता क्योंकि ये उसके DNA मे ही नहीं.....*
-:निवेदक:-
*अनुराग यादव अतुल*
*जिला सचिव*
*समाजवादी छात्रसभा-मऊ*
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*कम से कम 5 लोगो को शेयर करें*

जस्टिस कर्णन (मुलनिवासी) ने किया भ्रष्‍टाचारी सुप्रीम कोर्ट के ब्राह्माणवादी जजों के पर्दाफास - 100 करोर मुलनिवासी आगे बडो

ब्राह्माणवादी जार्ज ने दलित जस्टीस को अरेस्ट करने के वारंट दिया .. हमें Evm की तरह सुप्रीमकोर्ट व हाइकोर्टों को ब्राह्माणवादी जजों को भी भारत से भगाना ही होगा!ब्राह्माणवादी मुक्त भारत=विश्वगुरू भारत!
अगर आरोप सही तो अवमानना कैसे हो सकता है? बिना जाँच आरोप सही या गलत फैसला कैसे हो सकता है?
जस्टिस कर्णन ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुला पत्र लिखकर ‘न्‍यायपालिका में भारी भ्रष्‍टाचार’ के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा था। 23 जनवरी को लिखे गए पत्र में जज कर्णन ने ‘भ्रष्‍टाचारी जजों की शुरुआती सूची’ भी बनाई और सुप्रीम कोर्ट और उच्‍च न्‍यायालयों के 20 जजों के नाम उसमें शामिल किए।


शीर्ष अदालत और हाई कोर्ट के कई वर्तमान और रिटायर्ड जजों पर भ्रष्‍टाचार के आरोप लगाये जिस सुप्रीम कोर्ट ने बिना किसी जाँच के स्‍वत: संज्ञान लेने हुए अवमानना की कार्रवाई शुरू की है। इस के लिए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया समेत सुप्रीम कोर्ट के सात वरिष्‍ठतम जज, कलकत्‍ता हाई कोर्ट जज सीएस कर्णन के खिलाफ अवमानना की कार्रवाई करना सुरु कर दिया।
जस्टिस कर्णन ने जो संगीन और गम्भीर आरोप न्यायपालिका पर लगाये है निश्चित रूप से विचारनीय है। यह आरोप और भी गम्भीर हो जाता है जब यह भारतीय न्यायपालिका के एक प्रमुख अंग ने ही इसके शीर्ष को जातिवादी बता दिया है। हाई कोर्ट के इस जज ने पूरी जिम्मेदारी से कई सारे वरिष्ठतम जजों पर आरोप लगाए हैं, तो यह पूरी तरह स्पष्ट होना चाहिए कि आरोप सही हैं या गलत।
जबकि सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस कर्णन के कई पत्रों और बयानों का संज्ञान लिया है और उसी आधार पर कार्रवाई बिना की ठोस जाँच के अवमानना का कार्यवायी शुरू कर दिया है जो विधि संगत नहीं है।
हाई कोर्ट के किसी जज को सिर्फ संसद में महाभियोग द्वारा ही हटाया जा सकता है। ऐसी कोई भी शक्ति शीर्ष अदालत को नहीं है। इसलिए, शीर्ष अदालत के पास जो विकल्‍प मौजूद हैं, उनमें उनकी शक्तियों पर नियंत्रण संबंधी आदेश जारी कर स्‍वत: संज्ञान लेकर अवमानना कार्रवाई शुरू कर दिया है। जस्टिस कर्णन की न्‍यायिक शक्तियां वापस लेने और उन्‍हें कोई काम न देने का न्‍यायिक आदेश जारी करना भी शामिल है।
अगर जस्टिस कर्णन के लगाये गये आरोप सच्चे हों, तो क्या आरोप लगाने वाले के खिलाफ अवमानना का मामला अपने आप खारिज नहीं हो जाना चाहिए? परंतु इसके लिए जरुरी है कि लगाये गये आरोपों की जाँच हो। परंतु शीर्ष अदालत इन आरोपों की जाँच से क्यों बच रहा है। अच्छा होगा कि इस मुकदमे की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट अपने फैसलों की कसौटी सिर्फ और सिर्फ सत्य अर्थात जाँच के उपरान्त आये रिपोर्ट को ही बनाए। दोनों में से किसी भी पक्ष की तरफ से अगर तथ्यों को छुपाने की या मामले को ठंडे बस्ते में डालने की कोशिश होती है तो न्यायपालिका की साख पर इसका सीधा बुरा असर पड़ेगा। दूसरी तरफ, अगर यह मामला दलित पहचान का अनुचित लाभ उठाने का है तो भी इस कारवाई होनी चाहिए।
परंतु सुप्रीम कोर्ट ने बिना किसी जाँच के स्वत: सज्ञान लेते हुए जस्टिस कर्णन के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही सुरु कर दिया है तथा इनके खिलाफ जमानती वारंट जारी किया था। इस जमानती वारंट को देने के लिए कर्णन के घर लगभग 100 पुलिस वाले पहुंचे थे। उनके साथ कोलकाता पुलिस आयुक्त भी मौजूद थे। लेकिन कर्णन ने वारंट लेने से इंकार किया दिया है।यहाँ सवाल यह भी है कर्णन के घर पुलिस आयुक्त के साथ 100 पुलिस वाले क्यों गये! क्या जस्टिस कर्णन कोई अपराधी है??
वही सुप्रीम कोर्ट ने जस्टिस कर्णन के खिलाफ जमानती वारंट जारी किए थे और 10 हजार का पर्सनल बॉन्ड भी भरने के आदेश दिए थे। पश्चिम बंगाल के डीजीपी को वारंट की तामील कराने को कहा गया था। 31 मार्च से पहले जस्टिस कर्णन को सुप्रीम कोर्ट में पेश होने के आदेश दिए गए थे। जस्टिस कर्णन अवमानना के मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद न तो पेश हो रहे है और नहीं अभी कोई जबाब दिए है। -संतोष यादव, अधिवक्ता, सर्वोच्य न्यायालय भारत & नेशनल प्रसिडेंट पी आई एल फाउंडेशन, दिल्ली 

महिला टीचर के अपमान: ब्राह्माणवादी मनोज तिवारी के खिलाफ मुलनिवासी प्रदर्शन

मनुवादी लोग अपने मा बेहेन के इज़्ज़त नही करता वो करेगा दूसरी औरत के सम्मान?
 हैं मनोज तिवारी! नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली से सांसद और इस वक़्त भाजपा के दिल्ली यूनिट प्रमुख भी! इस महिला शिक्षक ने उनसे गाने के लिए निवेदन क्या कर दिया, इन्होंने उसका बुरी तरह अपमान कर डाला और मंच से नीचे बैठ जाने के लिए कहते हुए एक्शन लेने की धमकी भी दे डाली! जनाब निवेदन को विनम्रता से भी मना कर सकते थे! 




याद रहे ये वही इंसान है जिसने कभी कहा था कि बिहार के लड़को को दिल्ली की लड़कियों से साथ उतना ही व्यवहार रखना चाहिए जैसे प्रसाद खाने के बाद पत्तल फेंक दिया जाता है! इन्होंने नोटबंदी के बाद लाइन में खड़े लोगों को बेवकूफ़ बनाते हुए मज़ाक भी उड़ाया था! वैसे तो ये हर जगह बिना कहे गाने के लिए तैयार रहते हैं लेकिन यहाँ इनके अन्दर घुसा सांसद वाला श्रेष्ठताबोध चोटिल हो गया! अपने घटिया गानों से भोजपुरी भाषा को बदनाम करने में इनका नाम गिना जायेगा आने वाले समय में!

5 अंबेडकरबादी गाना: ब्राह्माणवादी के होश उराने के लिए

5 ब्राह्मंबाद विरोधी गाना हर मुलनिवासी को सुनना चाहिए. youtube से कलेक्ट किया गया 5 खूबसूरत गाना जो मनुवाद के खिलाफ गया गाया.. मेनस्ट्रीम कलाकार हमेशा ब्राह्माणवाद हे फेला ता है.. लेकिन देश भर मे शुरू हो गया मनुवाद के विरोध मे संग्राम ओर इसी के चलते बोह्त से मुलनिवासी सिंगर सोशियल मीडीया के ज़रिए अपना पकड़ बना रहा है..

फिल्म : शुद्रा - थे राइज़िंग
बॅनर : रुद्राक्ष अड्वेंचर पवत्. ल्ट्ड.
डाइरेक्टर : संजीव जायसवाल
सिंगर : जान निस्सर लोन & रानी हज़ारीका
म्यूज़िक : जान निस्सर लोन
लिरिक्स : शिव सागर सिंग



बेस्ट आंटी हिंदू स्पीच बाइ ambedkar


पंजाबी सॉंग ओं ड्र. बबसाहेब अंबेडकर बाइ गिननी माही



डॉ आंबेडकर की बेटी का सुपर रैप सांग (गाना) ब्राह्माणवाद पे वार



मराठी मुलनिवासी गाना

मंदिर के धन भंडार मे ब्राह्मण आरक्षण के खिलाफ मुलनिवासी प्रदर्शन

मंदिर मे पुजारी पद पे सिर्फ़ ब्राह्मण अरक्षण क्यू??? मंदिर मे जमा हुआ लखो करोरो कालाधन ग़रीब 52% OBC ओर 25% Sc/St, दलित को बाँट देना चाहिए
मेरी भी निम्न मांगे है....

1. सदियों से ब्राह्मण जिस आरक्षण को अपना धर्म कहता आ रहा है वह खत्म हो, साथ ही शंकराचार्य की कुर्सी से एक जाति विशेष का अधिकार समाप्त हो।
2. धर्म के नाम पर अंध्वविश्वास पाखण्ड फैलाने वालों के खिलाफ विशेष कानून बनाया जाए।
3. देश में जितने में भी मंदिर रजिस्ट्रर्ड या गैर रजिस्टर्ड है सभी को सरकार अपने दायरे में ले, यहां आने वाली दान दक्षिणा पर सरकारी हक होना चाहिए।
4. देश के विख्यात मंदिरों में केवल ब्राह्मण जात का आरक्षण है ब्राह्मण ही केवल पूजा-पाठ, अर्चना, दान पात्र आदि पर नियंत्रण रखता है तो इस आरक्षण को समाप्त कर सभी जाति के पंडितों(SC ST ओबीसी) को नियुक्त किया जाना चाहिए सभी के लिए समान नीति हो।
5. जातिवाद एवं जातिया खत्म की जाए ताकि जिन लोगो का भ्रम है कि मुख से पैदा होने वाले जन्म से श्रेष्ठ होते है उनका भ्रम दूर हो
सहयोग एवं सुझाव आमंत्रित है

टीपू सुल्तान: 700 ब्राह्माणवादी के खिलाफ लड़कर मुलनिवासी महिलाओं को स्थन ढकने का अधिकार

सोशियल मीडीया पे ब्राह्माणवादी यानी मनुवादी लोग मातम मानता है के टीपू ने 700 ब्राह्मण को मार दिया था.
टीपू सुलतान ने दि थी अछूत महिलाओं को स्थन ढकने की अनुमति, वही खीज आज निकाली जा रही है ।
इतिहास के झरोखे से :-टीपू सुल्तान और स्त्री स्वतंत्रता
कोई भी राजा हो क्या वह अन्याय इसलिए ना देखे और दंड ना दे कि यह अन्यायी उसके धर्म का नहीं और इस कारण से भविष्य में उस पर अन्य धर्मों के उपर किये अत्याचार के लिए गालियाँ दी जाएंगी ?

संघी और वाम इतिहासकारों ने टीपू सुल्तान को लेकर थोड़ा बड़ा दिल दिखाया पर अब टीपू सुल्तान को भी विवादित करने का प्रयास किया गया और औरंगजेब के जैसा बनाने का प्रयास किया गया , इतिहासकार टीपू सुल्तान के प्रति इस लिए झूठ ना लिख सके क्युँकि टीपू सुल्तान का सारा इतिहास बहुत करीब के दिनों का है और यह तथ्य और सबूत है कि वह अंग्रेज़ों से लड़ते हुए शहीद हुए और अपनी पूरी सल्तनत बर्बाद कर दी।
दरअसल उनको बदनाम भी केवल सवर्ण कर रहे हैं , हकीक़त यह है कि यदि इस देश के इतिहास को यदि निष्पक्ष रूप से लिख दिया जाए तो आज अचानक पैदा हो गये बड़े बड़े महापुरुष नंगे हो जाएँ और जिन्हें खलनायक बनाया जा रहा है वह देश के महापुरुष हो जाएँ ।
राजाओं की साम्राज्यवाद के कारणों से हुई लड़ाईयों को हिन्दू मुस्लिम की लड़ाई की तरह से अब प्रस्तुत किया जा रहा है और लडाई में मरने वाले सैनिकों को गिन गिन कर बताया जा रहा है कि इतने वध उस मुस्लिम शासक ने किये जैसे हिन्दू राजाओं ने युद्ध में विरोधी सेनाओं का धर्म देखकर ही मारा हो कि केवल मुस्लिम सैनिक मारें जाएँ हिन्दू सैनिकों को कोई नुकसान ना हो चाहे विरोधी सेना का ही क्युँ ना हो ।
तब तो ऐसा कुछ नहीं हुआ पर अब ऐसा ही किया जा रहा है ।
ब्रिटेन की नेशनल आर्मी म्यूजियम ने अंग्रेजी हुकूमत से लोहा लेने वाले 20 सबसे बड़े दुश्मनों की लिस्ट बनाई है जिसमें केवल दो भारतीय योद्धाओं को ही इसमें जगह दी गई है
नेशनल आर्मी म्यूजियम के आलेख के अनुसार टीपू सुल्तान अपनी फौज को यूरोपियन तकनीक के साथ ट्रेनिंग देने में विश्वास रखते थे। टीपू विज्ञान और गणित में गहरी रुचि रखते थे और उनके मिसाइल अंग्रेजों के मिसाइल से ज्यादा उन्नत थे, जिनकी मारक क्षमता दो किलोमीटर तक थी।
जो अंग्रेज टीपू से इतना घबराते थे उनके बनाए झूठे इतिहास को दिखाकर संघ के लोग टिपू का विरोध कर रहे हैं ।सच यह है कि विरोध कर रहे ऐसे लोग ही भारत के निष्पक्ष इतिहास के लिखने पर नंगे हो जाएँगे क्युँकि यही हर दौर में अत्याचारी रहे हैं और इसी अत्याचार को करने के लिये इन लोगों ने टीपू से अंग्रेजों की लड़ाई में अंग्रेज़ो का साथ दिया ।
त्रावणकोर के सवर्ण महाराजा , मराठे और हैदराबाद के निजाम अंग्रेजों के सबसे बड़े मित्र थे जो चारों ने मिलकर एक अकेले टीपू सुल्तान के विरूद्ध युद्व किया जिससे इनकी ऐय्याशियाँ चलती रहें देश जाए भाड़ में , चाहे इसपर अंग्रेजों का राज हो या राक्षसों का ।
दरअसल जो ब्राम्हणों की हत्याएं करने का आरोप टीपू सुल्तान पर है वह त्रावणकोर राज्य में है जहाँ का ब्राम्हण राजा एक ऐय्याश और निरंकुश राजा था और उसके जुल्मों से वहाँ की जनता से छुटकारा दिलाने के लिए टीपू ने उसपर आक्रमण किया और युद्ध में त्रावणकोर की सेना में शामिल ब्राम्हण मारे गये। और अंततः राजा को वहाँ की दलित महिलाओं को न्याय देना पड़ा ।
केरल के त्रावणकोर इलाके, खास तौर पर वहां की महिलाओं के लिए 26 जुलाई का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। इसी दिन 1859 में वहां के महाराजा ने दलित औरतों को शरीर के ऊपरी भाग पर कपड़े पहनने की इजाजत दी।
इस परंपरा की चर्चा में खास तौर पर निचली जाति नादर की स्त्रियों का जिक्र होता है क्योंकि अपने वस्त्र पहनने के हक के लिए उन्होंने ही सबसे पहले विरोध जताया और जिनको हक दिलाने के लिए टीपू सुल्तान ने उस राज्य पर आक्रमण किया।
दरअसल उस समय न सिर्फ पिछड़ी और दलित बल्कि नंबूदिरी ब्राहमण और क्षत्रिय नायर जैसी जातियों की औरतों पर भी शरीर का ऊपरी हिस्सा ढकने से रोकने के कई नियम थे।
नंबूदिरी औरतों को घर के भीतर ऊपरी शरीर को खुला रखना पड़ता था। वे घर से बाहर निकलते समय ही अपना सीना ढक सकती थीं। लेकिन मंदिर में उन्हें ऊपरी वस्त्र खोलकर ही जाना होता था। नायर औरतों को ब्राह्मण पुरुषों के सामने अपना वक्ष खुला रखना होता था।
सबसे बुरी स्थिति दलित औरतों की थी जिन्हें कहीं भी अंगवस्त्र पहनने की मनाही थी। पहनने पर उन्हें सजा भी हो जाती थी। एक घटना बताई जाती है जिसमें एक दलित जाति की महिला अपना सीना ढक कर महल में आई तो रानी अत्तिंगल ने उसके स्तन कटवा देने का आदेश दे डाला।
इस अपमानजनक रिवाज के खिलाफ 19 वीं सदी के शुरू में आवाजें उठनी शुरू हुईं। 18 वीं सदी के अंत और 19 वीं सदी के शुरू में केरल से कई मजदूर, खासकर नादन जाति के लोग, चाय बागानों में काम करने के लिए श्रीलंका चले गए। बेहतर आर्थिक स्थिति, धर्म बदल कर ईसाई बन जाने औऱ यूरोपीय असर की वजह से इनमें जागरूकता ज्यादा थी और ये औरतें अपने शरीर को पूरा ढकने लगी थीं।
धर्म-परिवर्तन करके ईसाई बन जाने वाली नादर महिलाओं ने भी इस प्रगतिशील कदम को अपनाया। इस तरह महिलाएं अक्सर इस सामाजिक प्रतिबंध को अनदेखा कर सम्मानजनक जीवन पाने की कशिश करती रहीं।यह कुलीन मर्दों को बर्दाश्त नहीं हुआ। ऐसी महिलाओं पर हिंसक हमले होने लगे। जो भी इस नियम की अहेलना करती उसे सरे बाजार अपने ऊपरी वस्त्र उतारने को मजबूर किया जाता।
दलित औरतों को छूना न पड़े इसके लिए सवर्ण पुरुष लंबे डंडे के सिरे पर छुरी बांध लेते और किसी महिला को ब्लाउज या कंचुकी पहना देखते तो उसे दूर से ही छुरी से फाड़ देते। यहां तक कि वे औरतों को इस हाल में रस्सी से बांध कर सरे आम पेड़ पर लटका देते ताकि दूसरी औरतें ऐसा करते डरें।
1814 में त्रावणकोर के अंग्रेजों के चमचे दीवान कर्नल मुनरो ने आदेश निकलवाया कि ईसाई नादन और नादर महिलाएं ब्लाउज पहन सकती हैं।
लेकिन इसका कोई फायदा न हुआ। उच्च सवर्ण के पुरुष इस आदेश के बावजूद लगातार महिलाओं को अपनी ताकत और असर के सहारे इस शर्मनाक अवस्था की ओर धकेलते रहे।आठ साल बाद फिर ऐसा ही आदेश निकाला गया। एक तरफ शर्मनाक स्थिति से उबरने की चेतना का जागना और दूसरी तरफ समर्थन में अंग्रेजी सरकार का आदेश। और ज्यादा महिलाओं ने शालीन कपड़े पहनने शुरू कर दिए। इधर उच्च वर्ग के पुरुषों का प्रतिरोध भी उतना ही तीखा हो गया। एक घटना बताई जाती है कि नादर ईसाई महिलाओं का एक दल निचली अदालत में ऐसे ही एक मामले में गवाही देने पहुंचा। उन्हें दीवान मुनरो की आंखों के सामने अदालत के दरवाजे पर अपने अंग वस्त्र उतार कर रख देने पड़े। तभी वे भीतर जा पाईं। संघर्ष लगातार बढ़ रहा था और उसका हिंसक प्रतिरोध भी।सवर्णों के अलावा राजा खुद भी परंपरा निभाने के पक्ष में था।
क्यों न होता ? आदेश था कि महल से मंदिर तक राजा की सवारी निकले तो रास्ते पर दोनों ओर नीची दलित जातियों की अर्धनग्न कुंवारी महिलाएं फूल बरसाती हुई खड़ी रहें। उस रास्ते के घरों के छज्जों पर भी राजा के स्वागत में औरतों को ख़ड़ा रखा जाता था। राजा और उसके काफिले के सभी पुरुष इन दृष्यों का भरपूर आनंद लेते थे।
आखिर 1829 में इस मामले में एक महत्वपूर्ण मोड़ आया।सवर्ण पुरुषों की लगातार नाराजगी के कारण राजा ने आदेश निकलवा दिया कि किसी भी दलित जाति की औरत अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा ढक नहीं सकती। अब तक ईसाई औरतों को जो थोड़ा समर्थन दीवान के आदेशों से मिल रहा था, वह भी खत्म हो गया। अब हिंदू-ईसाई सभी वंचित महिलाएं एक हो गईं और उनके विरोध की ताकत बढ़ गई। सभी जगह महिलाएं पूरे कपड़ों में बाहर निकलने लगीं। इस पूरे आंदोलन का सीधा संबंध भारत की आजादी की लड़ाई के इतिहास से भी है।
टीपू सुल्तान ने इसी अन्याय को समाप्त करने के लिए त्रावणकोर पर आक्रमण किया जिससे त्रावणकोर की सेना के तमाम लोग मारे गये जिसे आज ब्राम्हणों के वध के रूप में बताकर उनका विरोध किया जा रहा है उसी युद्व में विरोधियों ने ऊंची जातियों के लोगों दुकानों और सामान को लूटना शुरू कर दिया। राज्य में शांति पूरी तरह भंग हो गई।
दूसरी तरफ नारायण गुरु और अन्य सामाजिक, धार्मिक गुरुओं ने भी इस सामाजिक रूढ़ि का विरोध किया और अंततः 26 जुलाई 1859 को वहाँ के राजा ने दलित औरतों को स्तन ढकने की अनुमति प्रदान की ।टीपू सुल्तान से वही खीज आज निकाली जा रही है ।
ज़रा सोचिएगा कि त्रावणकोर का राजा कोई मुस्लिम होता और दलितों के साथ ऐसा व्यवहार होता तो आज क्या स्थिति होती और यदि टीपू कोई दीपू होते तो

ब्राह्माणवादी ने मारा बाबा साहेब आंबेडकर के मूर्ति को जूता - 85% मुलनिवासी के भावना आहत

देश के संविधान लिखने वाला बाबा साहेब आम्बेडकर के मूर्ति का घोर अपमान किया गया..ब्राह्माणवादी ने इस वीडियो को सोशियल मीडीया पे भी डाला..3% ब्राह्मण आज 85% मुलनिवासी के मसीहा के अपमान कर रहा है..न्बा पोलीस ना प्रशसन कोई रोकने वाला . इसे



जापान ,जर्मनी, नीदरलैंड ,इंग्लैंड ,फ़्रांस जैसे developed देश बैलेट पेपर पर चुनाव कराते और भारत जहा 80 करोड़ गरीब भूखे नंगे लोग रहते है वो देश EVM मशीन से चुनाव क्यों कराता है ,
जानते हो क्यों ?
1993 में बैलेट पेपर से हुए चुनाव से जब सपा बसपा ने यूपी से ब्राह्मणों की दो बडी पार्टी "कांग्रेस बीजेपी" दोनों को ख़त्म कर दिया था तब ब्राह्मण घबरा गए की अगर लोग सपा बसपा से जुड़ गए और इसी तरह बैलेट पेपर से चुनाव होते रहे तो कांग्रेस बीजेपी पूरे देश से ख़त्म हो जायेगी ,इसलिए ब्राह्मणों ने EVM मशीन से चुनाव कराने का षड्यंत्र रचा और उसी समय जिस EVM मशीन को यूरोप में गड़बड़ी के चलते बंद किया जा रहा था उसी मशीन को ब्राह्मण 1999 में भारत ले आये ताकि EVM मशीन में गड़बड़ी कर धीरे धीरे सपा बसपा को यूपी से भी ख़त्म किया जा सके और दुबारा ब्राह्मणों की पार्टियों मतलब कांग्रेस बीजेपी का राज लाया जा सके । ब्राह्मणों ने मकसद 2017 में पूरा किया ,जानबूझकर धीरे धीरे किया ताकि किसी को शक न हो ।

EVM सपोर्ट: अन्ना हज़ारे ने दिखाया आपना ब्राह्माणवादी चड्डी

अन्ना हज़ारे ने दिखाया आपना ब्राह्माणवादी चड्डी. देश मे मुलनिवासी आंदोलन रोकने के लिए संघ ने अन्ना हज़ारे को नया गाँधी बनाके मार्केट मे लाया था. डेमॉनेटिज़ेशन के चलते 150 भारतिया नागरिक मरने के बाद भी चुप रहने वाला ब्राह्माणवादी अन्ना ने EVM के सपोर्ट किया और वाजपा के सरकार को सही ठहराया.. देश भर मे EVM के खिलाफ OBC Sc ST Dalit Muslim Sikh ने आंदोलन कर रहा है..ये बात सबको पता चल गया के EVM मशीन को हॅक किया गया फिर भी मनुवादी मीडीया ने लगातार इस आंदोलन को दबाने क कौसीस मे लगे है..



ब्राह्मण गुंडा ने दलित विधयक के सर फोडा - घोटाला करके चुनाव जितने के बाद

रामराज्य की शुरुवात ।। बहुत हुआ गुंडाराज क्यों कि अबकी बीजेपी की सरकार ।।




सत्ता के नशे में चूर भाजपा नेता ....
दलित युवक को पीटकर किया लहूलुहान ....!!
इलाहाबाद : इसे सत्ता की हनक ही कह सकते हैं कि भाजपा नेता सहर उत्तरी इलाहबाद से नवनिर्वाचित विधायक हर्ष वर्धन वाजपेयी के पिता एवं कौशाम्बी सांसद विनोद सोनकर की सह पर भाजपा नेताओं ने गुंडागर्दी की हद ही पार कर दी, गुंडागर्दी की हद तब पार हो गयी जब भाजपा नेताओं ने खुलेआम एसओ कैंट को धमकी दी, कैंट थानांतर्गत राजपुर निवाशी प्रमोद पासी उसके भाई एवं उसकी माँ को मार पीटकर किया लहूलुहान किया..!!